Sunday, November 27, 2011

निसार मैं तेरी गलियों

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निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले


है अहल-ए-दिल के लिये अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद


बहोत हैं ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिये
जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम लेवा हैं
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी, मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें, किस से मुंसिफ़ी चाहें


मगर गुज़रनेवालों के दिन गुज़रते हैं
तेरे फ़िराक़ में यूँ सुबह-ओ-शाम करते हैं


बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है
कि तेरी मांग सितारों से भर गई होगी
चमक उठे हैं सलासिल तो हमने जाना है
कि अब सहर तेरे रुख़ पर बिखर गई होगी


ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दिवार-ओ-दर में जीते हैं


यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई


इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते
तेरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते


ग़र आज तुझसे जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
ग़र आज औज पे है ताल-ए-रक़ीब तो क्या
ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं


जो तुझसे अह्द-ए-वफ़ा उस्तवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-निहार रखते हैं


-फैज अहमद 'फैज'

आ कि वाबस्ता हैं

आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रखा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था

आशना हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवाँ गुज़रे हैं जिनसे इसी र’अनाई के
जिसकी इन आँखों ने बेसूद इबादत की है

तुझ से खेली हैं वह महबूब हवाएँ जिनमें
उसके मलबूस की अफ़सुर्दा महक बाक़ी है
तुझ पे भी बरसा है उस बाम से मेहताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है

तू ने देखी है वह पेशानी वह रुख़सार वह होंठ
ज़िन्दगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हमने
तुझ पे उठी हैं वह खोई-खोई साहिर आँखें
तुझको मालूम है क्यों उम्र गँवा दी हमने

हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़मे-उल्फ़त के
इतने एहसान कि गिनवाऊं तो गिनवा न सकूँ
हमने इस इश्क़ में क्या खोया क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ

आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिर्मां के दुख-दर्द के म’आनी सीखे
ज़ेर द्स्तों के मसाएब को समझना सीखा
सर्द आहों के, रुख़े ज़र्द के म’आनी सीखे

जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिनके
अश्क आंखों में बिलकते हुए सो जाते हैं
नातवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तौले हुए मंडराते हुए आते हैं

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग-सी सीने में रह-रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है



-फैज अहमद 'फैज'

बोल मजूरे हल्ला बोल

बोल मजूरे हल्ला बोल
काँप रही सरमाएदारी खुलके रहेगी इसकी पोल
बोल मजूरे हल्ला बोल!

ख़ून को अपने बना पसीना तेने बाग लगाया है
कुँए खोदे नहर निकाली ऊँचा महल उठाया है
चट्‌टानों में फूल खिलाए शहर बसाए जंगल में
अपने चौड़े कंधों पर दुनिया को यहाँ तक लाया है,
बाँकी फौज कमेरों की है, तू है नही भेड़ों का गोल!
बोल मजूरे हल्ला बोल!

गोदामों में माल भरा है, नोट भरे हैं बोरों में
बेहोशों को होश नही है, नशा चढ़ा है जोरों में
ऐसे में तू हाँक लगा दे- ला मेरी मेहनत का मोल!
बोल मजूरे हल्ला बोल!

सिहर उठेगी लहर नदी की, दहक उठेगी फुलवारी
काँप उठेगी पत्ती-पत्ती, चटखेगी डारी डारी,
सरमाएदारों का पल में नशा हिरन हो जाएगा
आग लगेगी नंदन वन में सुलग उठेगी हर क्यारी
सुन-सुनकर तेरे नारों को धरती होगी डाँवाडोल!
बोल मजूरे हल्ला बोल! 



-कांतिमोहन 'सोज़'

Saturday, November 26, 2011

दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांगउटांग!

स्वप्न के भीतर स्वप्न,
विचारधारा के भीतर और
एक अन्य
सघन विचारधारा प्रच्छन!!
कथ्य के भीतर एक अनुरोधी
विरुद्ध विपरीत,
नेपथ्य संगीत!!
मस्तिष्क के भीतर एक मस्तिष्क
उसके भी अन्दर एक और कक्ष
कक्ष के भीतर

        एक गुप्त प्रकोष्ठ और

कोठे के साँवले गुहान्धकार में
मजबूत...सन्दूक़
दृढ़, भारी-भरकम
और उस सन्दूक़ भीतर कोई बन्द है
यक्ष
या कि ओरांगउटांग हाय
अरे! डर यह है...
न ओरांग...उटांग कहीं छूट जाय,
कहीं प्रत्यक्ष न यक्ष हो।
क़रीने से सजे हुए संस्कृत...प्रभामय
अध्ययन-गृह में
बहस उठ खड़ी जब होती है--
विवाद में हिस्सा लेता हुआ मैं
सुनता हूँ ध्यान से
अपने ही शब्दों का नाद, प्रवाह और
पाता हूँ अक्समात्
स्वयं के स्वर में
ओरांगउटांग की बौखलाती हुंकृति ध्वनियाँ
एकाएक भयभीत
पाता हूँ पसीने से सिंचित
अपना यह नग्न मन!
हाय-हाय औऱ न जान ले
कि नग्न और विद्रूप
असत्य शक्ति का प्रतिरूप
प्राकृत औरांग...उटांग यह
मुझमें छिपा हुआ है।

स्वयं की ग्रीवा पर
फेरता हूँ हाथ कि
करता हूँ महसूस
एकाएक गरदन पर उगी हुई
सघन अयाल और
शब्दों पर उगे हुए बाल तथा
वाक्यों में ओरांग...उटांग के

        बढ़े हुए नाख़ून!!

दीखती है सहसा
अपनी ही गुच्छेदार मूँछ

        जो कि बनती है कविता

अपने ही बड़े-बड़े दाँत
जो कि बनते है तर्क और
दीखता है प्रत्यक्ष
बौना यह भाल और

        झुका हुआ माथा

जाता हूँ चौंक मैं निज से
अपनी ही बालदार सज से

        कपाल की धज से।

और, मैं विद्रूप वेदना से ग्रस्त हो
करता हूँ धड़ से बन्द
वह सन्दूक़
करता हूँ महसूस
हाथ में पिस्तौल बन्दूक़!!
अगर कहीं पेटी वह खुल जाए,
ओरांगउटांग यदि उसमें से उठ पड़े,
धाँय धाँय गोली दागी जाएगी।
रक्ताल...फैला हुआ सब ओर
ओरांगउटांग का लाल-लाल
ख़ून, तत्काल...
ताला लगा देता हूँ में पेटी का
बन्द है सन्दूक़!!
अब इस प्रकोष्ठ के बाहस आ
अनेक कमरों को पार करता हुआ
संस्कृत प्रभामय अध्ययन-गृह में
अदृश्य रूप से प्रवेश कर
चली हुई बहस में भाग ले रहा हूँ!!
सोचता हूँ--विवाद में ग्रस्त कईं लोग

            कईं तल

सत्य के बहाने
स्वयं को चाहते है प्रस्थापित करना।
अहं को, तथ्य के बहाने।
मेरी जीभ एकाएक ताल से चिपकती

अक्ल क्षारयुक्त-सी होती है
और मेरी आँखें उन बहस करनेवालों के
कपड़ों में छिपी हुई
सघन रहस्यमय लम्बी पूँछ देखती!!
और मैं सोचता हूँ...
कैसे सत्य हैं--
ढाँक रखना चाहते हैं बड़े-बड़े

                नाख़ून!!

किसके लिए हैं वे बाघनख!!
कौन अभागा वह!! 



-मुक्तिबोध

'चांद का मुँह टेढ़ा है' से

 गंजे-सिर चांद की सँवलायी किरनों के जासूस
साम-सूम नगर में धीरे-धीरे घूम-घाम
नगर के कोनों के तिकोनों में छिपे है !!
चांद की कनखियों की कोण-गामी किरनें
पीली-पीली रोशनी की, बिछाती है
अंधेरे में, पट्टियाँ ।
देखती है नगर की ज़िन्दगी का टूटा-फूटा
उदास प्रसार वह ।..........

अंधेरे के पेट में से
ज्वालाओं की आँत बाहर निकल आय
वैसे, अरे, शब्दों की धार एक
बिजली के टॉर्च की रोशनी की मार एक
बरगद के खुरदरे अजगरी तने पर
फैल गयी अकस्मात्बरगद के खुरदरे अजगरी तने परफैल गये हाथ दो
मानो ह्रदय में छिपी हुई बातों ने सहसा
अंधेरे से बाहर आ भुजाएँ पसारी हों
फैले गये हाथ दो
चिपका गये पोस्टर
बाँके तिरछे वर्ण और
लाल नीले घनघोर
हड़ताली अक्षर

इन्ही हलचलों के ही कारण तो सहसा
बरगद में पले हुए पंखों की डरी हुई
चौंकी हुई अजीब-सी गन्दी फड़फड़
अंधेरे की आत्मा से करते हुए शिकायत
काँव-काँव करते हुए पक्षियों के जमघट
उड़ने लगे अकस्मात्
मानो अंधेरे के
ह्रदय में सन्देही शंकाओं के पक्षाघात !!
मद्धिम चांदनी में एकाएक एकाएक
खपरैलों पर ठहर गयी
बिल्ली एक चुपचाप
रजनी के निजी गुप्तचरों की प्रतिनिधि
पूँछ उठाये वह
जंगली तेज़
आँख
फैलाये
यमदूत-पुत्री-सी
(सभी देह स्याह, पर
पंजे सिर्फ़ श्वेत और
ख़ून टपकाते हुए नाख़ून)
देखती है मार्जार
चिपकाता कौन है
मकानों की पीठ पर
अहातों की भीत पर
बरगद की अजगरी डालों के फन्दों पर
अंधेरे के कन्धों पर
चिपकाता कौन है ?
चिपकाता कौन है
हड़ताली पोस्टर
बड़े-बड़े अक्षर
बाँके-तिरछे वर्ण और
लम्बे-चौड़े घनघोर
लाल-नीले भयंकर
हड़ताली पोस्टर !!..............

तिलक के पुतले पर बैठे हुए घुग्घू ने
देखा कि भयानक लाल मूँठ
काले आसमान में
तैरती-सी धीरे-धीरे जा रही

उद्गार-चिह्नाकार विकराल
तैरता था लाल-लाल !!
देख, उसने कहा कि वाह-वाह
रात के जहाँपनाह
इसीलिए आज-कल
दिल के उजाले में भी अंधेरे की साख है
रात्रि की काँखों में दबी हुई
संस्कृति-पाखी के पंख है सुरक्षित !!
...पी गया आसमान
रात्रि की अंधियाली सच्चाइयाँ घोंट के,
मनुष्यों को मारने के ख़ूब हैं ये टोटके !
गगन में करफ़्यू है,
ज़माने में ज़ोरदार ज़हरीली छिः थूः है !!...............


टेढ़े-मुँह चांद की ऐयारी रोशनी
भीमाकार पुलों के
ठीक नीचे बैठकर,
चोरों-सी उचक्कों-सी
नालों और झरनों के तटों पर
किनारे-किनारे चल,
पानी पर झुके हुएपेड़ों के नीचे बैठ,
रात-बे-रात वह
मछलियाँ फँसाती है
आवारा मछुओं-सी शोहदों-सी चांदनी.............

किंग्सवे में मशहूर
रात की है ज़िन्दगी !
सड़कों की श्रीमान्
भारतीय फिरंगी दुकान,
सुगन्धित प्रकाश में चमचमाता ईमान
रंगीन चमकती चीज़ों के सुरभित
स्पर्शों में
शीशों की सुविशाल झाँइयों के रमणीय
दृश्यों में
बसी थी चांदनी
खूबसूरत अमरीकी मैग्ज़ीन-पृष्ठों-सी
खुली थी,
नंगी-सी नारियों के
उघरे हुए अंगों के
विभिन्न पोज़ों मे
लेटी थी चांदनी
सफे़द
अण्डरवियर-सी, आधुनिक प्रतीकों में
फैली थी
चांदनी !
करफ़्यू नहीं यहाँ, पसन्दगी...सन्दली,
किंग्सवे में मशहूर रात की है ज़िन्दगी

अजी, यह चांदनी भी बड़ी मसखरी है !!.................

गुप्तचरी ताक में
जमी हुई खोजती है कौन वह
कन्धों पर अंधेरे के
चिपकाता कौन है
भड़कीले पोस्टर,
लम्बे-चौड़े वर्ण और
बाँके-तिरछे घनघोर
लाल-नीले अक्षर ।.................

मसान के उजाड़
पेड़ों की अंधियाली शाख पर
लाल-लाल लटके हुए
प्रकाश के चीथड़े--
हिलते हुए, डुलते हुए, लपट के पल्लू ।
सचाई के अध-जले मुर्दों की चिताओं की
फटी हुई, फूटी हुई दहक में कवियों ने
बहकती कविताएँ गाना शुरु किया ।
संस्कृति के कुहरीले धुएँ से भूतों के
गोल-गोल मटकों से चेहरों ने
नम्रता के घिघियाते स्वांग में
दुनिया को हाथ जोड़
कहना शुरु किया--
बुद्ध के स्तूप में
मानव के सपने
गड़ गये, गाड़े गये !!
ईसा के पंख सब
झड़ गये, झाड़े गये !!
सत्य की
देवदासी-चोलियाँ उतारी गयी
उघारी गयीं,
सपनों की आँते सब
चीरी गयीं, फाड़ी गयीं !!
बाक़ी सब खोल है,
ज़िन्दगी में झोल है !!..................

पेण्टर से कहा, भाई
चित्र बनाते वक़्त
सब स्वार्थ त्यागे जायँ,
अंधेरे से भरे हुए
ज़ीने की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती जो
अभिलाषा--अन्ध है
ऊपर के कमरे सब अपने लिए बन्द हैं
अपने लिए नहीं वे !!
ज़माने ने नगर से यह कहा कि
ग़लत है यह, भ्रम है
हमारा अधिकार सम्मिलित श्रम और
छीनने का दम है ।
फ़िलहाल तसवीरें
इस समय हम
नहीं बना पायेंगे
अलबत्ता पोस्टर हम लगा जायेंगे ।
हम धधकायेंगे ।
मानो या मानो मत
आज तो चन्द्र है, सविता है,
पोस्टर ही कविता है !!
वेदना के रक्त से लिखे गये
लाल-लाल घनघोर
धधकते पोस्टर
गलियों के कानों में बोलते हैं
धड़कती छाती की प्यार-भरी गरमी में
भाफ-बने आँसू के ख़ूँख़ार अक्षर !!
चटाख से लगी हुई
रायफ़ली गोली के धड़ाकों से टकरा
प्रतिरोधी अक्षर
ज़माने के पैग़म्बर
टूटता आसमान थामते हैं कन्धों पर
हड़ताली पोस्टर
कहते हैं पोस्टर--
आदमी की दर्द-भरी गहरी पुकार सुन
पड़ता है दौड़ जो
आदमी है वह ख़ूब
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,..............

भैंरों और बरगद में बहस खड़ी हुई है
ज़ोरदार जिरह कि कितना समय लगेगा
सुबह होगी कब और
मुश्किल होगी दूर कब
समय का कण-कण
गगन की कालिमा से
बूंद-बूंद चू रहा
तडित्-उजाला बन !!.................

-मुक्तिबोध

ऐ इन्सानों

आंधी के झूले पर झूलो
आग बबूला बन कर फूलो
कुरबानी करने को झूमो
लाल सबेरे का मूँह चूमो
ऐ इन्सानों ओस न चाटो
अपने हाथों पर्वत काटो

पथ की नदियाँ खींच निकालो
जीवन पीकर प्यास बुझालो
रोटी तुमको राम न देगा
वेद तुम्हारा काम न देगा
जो रोटी का युद्ध करेगा
वह रोटी को आप वरेगा ।



-मुक्तिबोध

पूंजीवादी समाज के प्रति

इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ। 



-मुक्तिबोध

Tuesday, November 22, 2011

दौलत-ए-दुनिया का हिसाब

तुम कि हो मुहतसिबे-सीमो-ज़रो-लालःओ-गुहर
हमसे क्या माँगते हो दौलत-ए-दुनिया का हिसाब
चन्द तस्वीरे-बुताँ चन्द हसीनों के ख़ुतूत
चन्द नाकर्दा गुनाहों के सुलगते हुए ख़्वाब

हाँ, मगर अपनी फ़क़ीरी में गनी हैं हम लोग
दौलते-दर्दे-दिलो-दर्दे-जिगर रखते हैं
खु़श्किए-लब है तो क्या, दीदःए-तर रखते हैं
अपने क़ब्ज़े में नहीं अतलस-ओ-संजाब-ओ-सुमूर
जिस्म पर पैरहने-शम्सो-क़मर रखते हैं
घर तो रौशन नहीं अल्मास के फ़ानूसों से
कस्र-ओ-ऐवाँ पे जो बरसे वो शरर रखते हैं
जो ज़माने को बदल दे वो नज़र रखते हैं

इस ख़ज़ाने में से जो चाहो उठा ले जाओ
और बढ़ जाता है यह माल जो कम होता है
हम पे तो रोज़ ज़माने का करम होता है
शाखे़-गुल बनता है जब हाथ क़लम होता है।

-अली सरदार जाफ़री

नयी नस्ल के नाम

मुझसे नज़रें चुरा कर कहाँ जाओगे
ऐ मेरे आफ़ताबो
राह में रात की बेकराँ झील है
और ऊँची हैं लहरें
असमाने सुख़न के नये माहताबो
तीरगी ढूँढ़ती फिर रही है तुम्हारा पता
और वो सिर्फ़ मैं जानता हूँ
दर्द की शाहरह से गुज़र कर
आँसुओं की नदी के किनारे
ग़म की बस्ती में जो नूर का झोंपडा़ है
उसमें रहते हो तुम
मेरी ही तरह ख़ानः-ख़राबी
सज़िशे कर्गसों की तरह उड़ रही हैं
उनके पर थक के गिर जाएँगे
और तुम्हारी बलन्दी न छू पाएँगे
तुम इसी तरह परवाज़ करते रहोगे
और तुम्हारे परों की चमक
कहकशाँ, कहकशाँ, गीत गाती रहेगी
ऐ मिरे शोलः-पैकर उक़ाबो

अपने लौहो-क़लम तो दिखाओ ज़रा
सच कहो, क्या तुम्हारे तराशे हुए लफ़्ज़ में
मेरी आवाज़ का शाइबः भी नहीं
मेरी आवाज़ जो पहले ग़ालिब की आवाज़ थी
और फिर रूहे-इक़बाल का ज़मज़म बन गई
आज के नग़्मः-ए-शौक़ में ढल गई
सुब्‌हे-फ़र्दा कि वादी में जूए-रवाँ है
मेरी आवाज़
पत्थर में शो’लः है
शो’ले में शबनम
और तूफ़ाँ में तूफ़ाँ
और तुम्हारे भी सीने में उसकी चुभन है
सच कहो
आने वाले ज़माने की रौशन किताबो

मुझसे नज़रें चुराकर कहाँ जाओगे?

-अली सरदार जाफ़री

नवम्बर, मेरा गहवारा से

हवाओं के तुन्द-ओ-तेज़ झोंके
जब आँधियों का लिबास पहने 
उतरते हैं गारते-चमन पर
तो शाखे़-गुल अपना सर झुकाकर सलाम करती है
और फिर सर उठा के हँसती है
और कहती है- मुझको देखो
मैं फ़ितरते-लाज़वाल का रंगे-शाइरी हूँ
वुज़ूद का रक़्से-दिलबरी हूँ
जिसे मिटाने की कोशिशें हैं
वो मिट सका है न मिट सकेगा
यह रंग सह्ने-बमन से उबलेगा
मक़्तलों से तुलूअ़ होगा...............


जियो तो अपने दिल-ओ-जाँ के मयकदे में जियो
ख़ुद अपने ख़ूने-जिगर की शराबे-नाब पियो
जहाँ के सामने जब आओ ताज़ा-रू आओ
हुज़ूरे-मुहतसिब-ओ शैख़ में सुबू लाओ
जो ज़ख़्म-ख़ुर्दा है वो नग़्मःए-गुलू लाओ
दिले-शिकस्ता में बढ़ने दो रौशनी ग़म की
ये रौशनी तो है मीरास इब्ने-आदम की
ये रौशनी कि जो तलवार भी सिपर भी है
मिरी निग़ाह में पैमानःए-हुनर भी है.............

-अली सरदार जाफ़री

क़त्ले-आफ़ताब

शफ़क़1 के रंग में है क़त्ले-आफ़ताब2 का रंग
उफ़ुक़3 के दिल में है ख़ंजर, लहूलुहान है शाम
सफ़ेद शीशा-ए-नूर और सिया बारिशे-संग4
ज़मीं से ता-ब-फ़लक5 है बलन्द रात का नाम

यकीं का ज़िक्र ही क्या है कि अब गुमाँ भी नहीं
मका़मे-दर्द नहीं, मंज़िले-फ़ुगाँ भी नहीं
वो बेहिसी6 है कि जो क़ाबिले-बयाँ भी नहीं
कोई तरंग ही बाक़ी रही न कोई उमंग
जबीने-शौक़7 नहीं संगे-आस्ताँ8 भी नहीं
रक़ीब9 जीत गये ख़त्म हो चुकी है जंग
हज़ार लब से जुनूँ सुन रहे हैं अफ़साना

दिलों में शो’ला-ए-ग़म बुझ गया है क्या कीजे
कोई हसीन नहीं किससे अब वफ़ा कीजे
सिवाय इसके कि क़ातिल ही को दुआ दीजे

मगर ये जंग नहीं वो जो ख़त्म हो जाए
इक इन्तिहा10 है फ़क़त हुस्ने-इब्तिदा11 के लिए
बिछे हैं ख़ार कि गुज़रेंगे क़ाफ़िले गुल के
ख़मोशी मुह्र-ब-लब12 है किसी सदा के लिए
उदासियाँ हैं ये सब नग़मःओ-नवा13 के लिए

वो पहना शम्‌अ़ ने फिर ख़ूने-आफ़ताव का ताज
सितारे ले के उठे नूरे-आफ़ताब14 के जाम
पलक-पलक पे फ़िरोज़ाँ15 हैं आँसुओं के चिराग़
लबें चमकती हैं या बिजलियाँ चमकती हैं
तमाम पैरहने-शब16 में भर गए हैं शरार17

चटक रही हैं कहीं तीरगी की दीवारें
लचक रही हैं कहीं शाख़े-गुल की तलवारें
सनक रही हैं कहीं दश्ते-सरकशी में हवा
चहक रही है कहीं बुलबुले-बहारे-नवा
महक रही है लबो-आरिज़ो-नज़र18 की शराब

जवान ख़्वाबों के जंगल से आ रही है नसीम
नफ़स में निक़हते-पैग़ामे-इन्क़िलाब19 लिए
ख़बर है क़ाफ़िलः-ए-रंगो-नूर निकलेगा
सहर के दोश पे20 इक ताज़ा आफ़ताब लिए
-अली सरदार जाफ़री
शब्दार्थ:
1. सवेरे या शाम के समय क्षितिज की लालिमा, 2. सूर्य का वध, 3. क्षितिज,
4. पत्थरों की बारिश, 5. धरती से क्षितिज तक, 6. चेतना या एहसास का अभाव,
7. चाव से झुकने वाला माथा, 8. दहलीज़ का पत्थर (झुकने के लिए), 9. प्रतिद्वन्द्वी,
10. समाप्ति,समापन, 11. केवल शुभारम्भ के सौंदर्य के लिए,
12. स्तब्ध,मौन,चुपी की मुहर लगवाए हुए, 13. गीत और स्वर, 14. सूर्य के प्रकाश,
15. आलोकित, 16. रात्रि के वस्त्रों,  17. अंगारे, 18. होंठों,गालों और आँखों,
19. इन्क़िलाब के पैग़ाम की ख़ुशबू, 20. काँधे पर

गुफ़्तगू

गुफ़्तगू बन्द न हो
बात से बात चले
सुब्‌ह तक शामे-मुलाक़ात चले
हम पे हँसती हुई ये तारों भरी रात चले

हाँ जो अलफ़ाज़ के हाथों में हैं संगे-दुश्नाम
तंज़ छलकाये तो छलकाया करे ज़हर के जाम
तीखी नज़रें हों तुर्श अबरुए-ख़मदार रहें
बन पडे़ जैसे भी दिल सीनों में बेदार रहें
बेबसी हर्फ़ को ज़ंजीर-ब-पा कर न सके
कोई क़ातिल हो मगर क़त्ले-नवा कर न सके

सुब्‌ह तक ढल के कोई हर्फ़े-वफ़ा आएगा
इश्क़ आयेगा बसद लग़ज़िशे-पा आएगा
नज़रें झुक जाएँगी, दिल धड़केंगे, लब काँपेंगे
ख़ामुशी बोसः ए-लब बनके महक जाएगी
सिर्फ़ ग़ुंचों के चटकने की सदा आएगी

और फिर हर्फ़ो-नवा की न ज़रूरत होगी
चश्मो-अबरू के इशारों में महब्बत होगी
नफ़रत उठ जायेगी, मेहमान मुरव्वत होगी

हाथ में हाथ लिये सारा जहाँ साथ लिये
तोहफ़ःए-दर्द लिए प्यार की सौग़ात लिये
रहगुज़ारों से अदावत के गुज़र जाएँगे
ख़ूँ के दरयाओं से हम पार उतर जाएँगे

गुफ़्तगू बन्द न हो
बात से बात चले
सुब्‌ह तक शामे-मुलाक़ात चले
हम पे हँसती हुई ये तारों भरी रात चले

-अली सरदार जाफ़री

निवाला

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूति मिल में है
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है
जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूक सरमाए की बढ़ाएगा
हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चाँदी का धन लुटाएगा
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
ख़ून उसका दिये जलाएगा
यह जो नन्हा है भोला-भाला है
सिर्फ़ सरमाये का निवाला है
पूछती है यह उसकी ख़ामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है

-अली सरदार जाफ़री

भूखी माँ, भूखा बच्चा

मेरे नन्हे, मिरे मासूम मिरे नूरे-नज़र
आ कि माँ अपने कलेजे से लगा ले तुझको
अपनी आग़ोशे-मुहब्बत में सुला ले तुझको
तेरे होंटों का यह जादू था कि सीने से मिरे
नदियाँ दूध की वह निकली थी
छातियाँ आज मिरी सूख गयी हैं लेकिन
आँखें सूखी नहीं अब तक मिरे लाल
दर्द का चश्म-ए-बेताब रवाँ है इनसे
मेरे अश्कों ही से तू प्यास बुझा ले अपनी
सुनती हूँ खेतों में अब नाज नहीं उग सकता
काँग्रेस राज में सोना ही फला करता है
गाय के थन से निकलती है चमकती चाँदी
और तिजोरी की दराज़ों में सिमट जाती है

चाँद से दूध नहीं बहता है
तारे चावल हैं न गेहूँ न ज्वार
वरना मैं तेरे लिए चाँद सितारे लाती
मेरे नन्हे, मिरे मासूम मिरे नूरे-नज़र
आ कि माँ अपने कलेजे से लगा ले तुझको
अपनी आग़ोशे-मुहब्बत मे सुला ले तुझको

सो भी जा मेरी महब्बत की कली
मेरी जवानी के गुलाब
मेरे इफ़लास के हीरे सो जा
नींद में आएँगी हँसती हुई परियाँ तिरे पास
बोतलें दूध की शरबत के कटोरे लेकर
जाने आवाज़ की लोरी थी कि परियों का तिलस्म
नींद-सी आने लगी बच्चे को

खिंच गयी नीलगूँ होंटों पे ख़मोशी की लकीर
मुट्ठियाँ खोल दीं और मूँद लीं आँखें अपनी
यूँ ढलकने लगा मनका जैसे
शाम के ग़ार में सूरज गिर जाए

झुक गयी माँ की जबीं बेटे की पेशानी पर
अब न आँसू थे, न सिसकी थी न लोरी न कलाम
एक सन्नाटा था
एक सन्नाटा था तारीको-तवील

-अली सरदार जाफ़री

"एशिया जाग उठा" से

यह एशिया की ज़मीं, तमद्दुन की कोख, तहज़ीब का वतन है
जबीं पे तारों का ताज, पैरों में झाग की झाँझनों का नग़मा
ज़मीन-सदियों पुराने हाथों में अपने लकडी़ के हल सँभाले
गरीब मज़दूर, जलती आँखें
उचाट नींदों की तल्ख़ रातें
थके हुए हाथ, भाप का ज़ोर, गर्म फ़ौलाद की रवानी
जहाज़, मल्लाह, गीत, तूफ़ाँ
कुम्हार, लोहार, चाक, बरतन
ग्वालनें दूध में नहायी
अलावों के गिर्द बूढ़े अफ़साना-गो, कहानी
जवान माँओं की गोद में नन्हे-नन्हे बच्चों के भोले चेहरे
लहकते मैदान, गायें, भैंसें
फ़ज़ाओं में बाँसुरी का लहरा
हरी-भरी खेतियों में शीशे की चूड़ियाँ खनखना रही हैं
उदास सहरा पयम्बरों की तरह से खा़मोश और गम्भीर
खजूर के पेड़ बाल खोले
दफ़ों की आवाज़ ढोलकों की गमक
समन्दर के क़हक़हे नारियल के पेड़ों की सर्द आहें..........

यह एशिया है, जवान, शादाब और धनवान एशिया है
कि जिसके निर्धन ग़रीब बच्चों को भूक के नाग डस रहे हैं
वो होंट जो माँ के दूध के बाद फिर न वाकि़फ़ हुए
कभी दूध के मज़े से
ज़बानें ऐसी जिन्होंने चक्खा नहीं है, गेहूँ की रोटियों को
वह पीठ जिसने सफ़ेद कपडा़ छुआ नहीं है
वो उँगलियाँ जो किताब से मस नहीं हुई हैं
वो पैर जो बूट और स्लीपर की शक्ल पहचानते नहीं हैं
वो सर जो तकियों की नर्म लज़्ज़त से बेख़बर हैं
वो पेट जो भूक ही को भोजन समझ रहे हैं
ये नादिरे-रोज़गार इंसाँ
तुम्हें फ़क़त एशिया की जन्नत ही में मिलेंगे
जो तीन सौ साल के ‘तमद्दुन’ के बाद भी ‘जानवर’रहे हैं
कहाँ हो ‘तहज़ीब और तमद्दुन’ की रौशनी लेके आनेवालो
तुम्हारी ‘तहज़ीब’ की नुमाइश है एशिया में.........

-अली सरदार जाफ़री

Thursday, November 17, 2011

ये किसका लहू है कौन मरा

ऐ रहबरे-मुल्को-कौम बता
आँखें तो उठा नज़रें तो मिला
कुछ हम भी सुने हमको भी बता
ये किसका लहू है कौन मरा…

धरती की सुलगती छाती पर
बेचैन शरारे पूछते हैं
हम लोग जिन्हें अपना न सके
वे खून के धारे पूछते हैं
सड़कों की जुबां चिल्लाती है
सागर के किनारे पूछते है|
ये किसका लहू है कौन मरा…

ऐ अज़्मे-फना देने वालो
पैगामे-वफ़ा देने वालो
अब आग से क्यूँ कतराते हो
मौजों को हवा देने वालो
तूफ़ान से अब क्यूँ डरते हो
शोलों को हवा देने वालो
क्या भूल गए अपना नारा
ये किसका लहू है कौन मरा

हम ठान चुके हैं अब जी में
हर जालिम से टकरायेंगे
तुम समझौते की आस रखो
हम आगे बढ़ते जायेंगे
हम मंजिले-आज़ादी की कसम
हर मंजिल पे दोहराएँगे
ये किसका लहू है कौन मरा…

–साहिर लुधियानवी
(1946 के नौसेना विद्रोह के समय लिखी नज़्म)

जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं

 जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं?

ये कूचे ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिन्दगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के?
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

ये पुरपेंच गलियां, ये बेख़ाब बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

तअफ्फ़ुन से पुर नीमरोशन ये गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द किलयां
ये बिकती हुई खोकली रंग रिलयां
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

वो उजाले दरीचों में पायल की छन-छन
तनफ़्फ़ुस की उलझन पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरों में खांसी की धन-धन
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

ये गूंजे हुए क़ह-क़हे रास्तों पर
ये चारों तरफ़ भीड़ सी खिड़िकयों पर
ये आवाज़ें खींचते हुए आंचलों पर
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये मदक़ूक़ चेहरे
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

ये भूकी निगाहें हसीनों की जानिब
ये बढ़ते हुए हाथ सीनों की जानिब
लपकते हुए पांव ज़ीनों की जानिब
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

यहां पीर भी आ चुके हैं जवां भी
तनूमन्द बेटे भी, अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी है, मां भी
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिन्स राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत ज़ुलैख़ा की बेटी
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?

ज़रा मुल्क के राहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मन्ज़र दिखाओ
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ को लाओ
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं? 



-साहिर लुधियानवी

वो सुबह हमीं से आयेगी

इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा
चाहत को ना कुचला जाएगा, इज्जत को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा
हक़ मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी


फाक़ों की चिताओ पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे
सीने के दहकते दोज़ख में अरमां न जलाए जाएंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

 जब धरती करवट बदलेगी, जब कैद से कैदी छूटेंगे

जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब जुल्म के बंधन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी!
वो सुबह हमीं से आयेगी!   

मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी! 


संसार के सारे मेहनतकश खेतों से मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इंसान तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अमन, खुशहाली के फूलॉ से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी! 


-साहिर लुधियानवी

अभी वही है निज़ामें-कोहना

अभी वही है निज़ामें-कोहना अभी तो ज़ुल्मों-सितम वही है
अभी मैं किस तरह मुस्कुराऊं अभी तो रंजो-अलम वही है!


नए ग़ुलामों अभी तो हाथों में है वही कास-ए-गदाई
अभी तो ग़ैरों का आसरा है अभी तो रस्मो-करम वही है!


अभी कहाँ खुल सका है परदा अभी कहाँ तुम हुए हो उरियाँ
अभी तो रहबर बने हुए हो अभी तुम्हारा भरम वही है!


अभी तो जम्हूरियत के साए में आमरीयत पनप रही है
हवस के हाथों में अब भी क़ानून का पुराना क़लम वही है!


अभी वही हैं उदास राहें वही हैं तरसी हुई निगाहें
शहर के पैग़म्बरों से कह दो यहाँ अभी शामे-ग़म वही है!


मैं कैसे मानूँ कि इन ख़ुदाओं की बन्दगी का तिलिस्म टूटा
अभी वही पीरे-मैक़दा है अभी तो शेख़ो-हरम वही है!



-खलीलुर्रहमान आज़मी

इंकलाब चाहिए

नफ़स-नफ़स कदम-कदम बस एक फिक्र दम ब दम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए
जवाब दर सवाल है के इंकलाब चाहिए
इंकलाब जिन्दाबाद, जिन्दाबाद इंकलाब -२

जहाँ आवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से
जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से
जहाँ पे लब्जे अमन एक खौफनाक राज़ हो
जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो
वहाँ न चुप रहेंगे हम कहेंगे हाँ कहेंगे हम
हमारा हक हमारा हक हमें जनाब चाहिए
जवाब दर सवाल है के इंकलाब चाहिए
इंकलाब जिन्दाबाद, इंकलाब इंकलाब -२

यकीन आँख मूँद कर किया था जिनको जानकर
वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तान कर
उन्ही की सरहदों में कैद हैं हमारी बोलियाँ
वही हमारी थाल में परस रहे हैं गोलियाँ
जो इनका भेद खोल दे हर एक बात बोल दे
हमारे हाथ में वही खुली किताब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए
जवाब दर सवाल है के इंकलाब चाहिए
इंकलाब जिन्दाबाद, जिन्दाबाद इंकलाब

वतन के नाम पर खुशी से जो हुए हैं बेवतन
उन्ही की आह बेअसर उन्ही की लाश बेकफान
लहू पसीना बेचकर जो पेट तक न भर सके
करे तो क्या करें भला जो जी सके न मर सके
स्याह ज़िंदगी के नाम जिनकी हर सुबह और शाम
उनके आसमान को सुर्ख आफ़ताब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए
जवाब दर सवाल है के इंकलाब चाहिए
इंकलाब जिन्दाबाद, जिन्दाबाद इंकलाब -2

तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल सोच और सोचकर सवाल कर
किधर गए वो वायदे सुखों के ख्वाब क्या हुए
तुझे था जिनका इंतज़ार वो जवाब क्या हुए
तू इनकी झूठी बात पर ना और ऐतबार कर
की तुझको साँस साँस का सही हिसाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए
नफ़स-नफ़स कदम-कदम बस एक फिक्र दम ब दम
जवाब दर सवाल है के इंकलाब चाहिए
इंकलाब जिन्दाबाद, जिन्दाबाद इंकलाब -२

--शलभ श्रीराम सिंह

तोड़ो बंधन तोड़ो

तोड़ो बंधन तोड़ो
ये अन्‍याय के बंधन
तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो…
हम क्‍या जानें भारत भी में भी आया है स्‍वराज
ओ भइया आया है स्‍वराज
आज भी हम भूखे-नंगे हैं आज भी हम मोहताज
ओ भइया आज भी हम मोहताज
रोटी मांगे तो खायें हम लाठी-गोली आज
थैलीशाहों की ठोकर में सारे देश की लाज
ऐ मज़दूर और किसानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों
ऐ छात्रो और जवानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों
झूठी आशा छोड़ो…
तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो!


 सौ-सौ वादे  करके हमसे लिए जिन्होंने वोट
ओ भइया लिए जिन्होंने वोट
गरीबी हटाओ कहके हमको देते हैं ये चोट
ओ भइया देते हैं ये चोट
 नौकरी मांगे नारे मिलते कैसा झूठा राज
शोषण के जूतों से पीसकर रोता भारत आज
ऐ मज़दूर और किसानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों
ऐ छात्रो और जवानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों
झूठी आशा छोड़ो…
तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो!


-इप्टा

आ रे नौजवान

आ रे नौजवान
आ रे नौजवान तेरी बेड़ियाँ रही हैं टूट
क्रांति का नया कदम बढ़ा
क्रांति का नया कदम बढ़ा

बढ़ रहा है आज तेरा कारवाँ
सर झुका रहा जमीन को आसमां
राह की सफों को तूने कर लिया है पार
सामने की मंजिलें रहीं तुझे पुकार
उठ गुलाम उठ गुलाम
उठ गुलाम जिंदगी के बंधनों को तोड़ दे
चल सुबह की रौशनी में डगमगाना छोड़ दे| आ रे नौजवान…

अब सुना न जुल्म की कहानियां
दांव पर लगा दे नौजवानियाँ
ख़त्म हो चली हैं ऐशो-हुक्मारानियाँ
ख़त्म हो चली हैं ये वीरानियाँ
उठ गुलाम उठ गुलाम
उठ गुलाम जिंदगी के बंधनों को तोड़ दे
चल सुबह की रौशनी में डगमगाना छोड़ दे| आ रे नौजवान…

-इप्टा

हम देखेंगे

हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
हम देखेंगे।
जो लाहे अजल में लिखा है
हम देखेंगे
लाजम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे .
जब जुल्मो-सितम के कोहे गरां
रूई की तरह उड़ जायेंगे
हम महरूमों के पांव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़केगी
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे
जब अरजे खुदा के काबे से
सब बुत उठवाये जायेंगे
हम अहले सफा मरदूदे हरम
मसनद पे बिठाये जायेंगे
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे .
बस नाम रहेगा अल्ला का
जो गायब भी हाजर भी
जो नाजिर भी है मंजर भी
उठेगा अनलहक का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्के खुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे
-फैज अहमद 'फैज'

बोल अरी ओ धरती बोल

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी
बूढ़े़, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी
बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

कलजुग में जग के रखवाले चांदी वाले सोने वाले,
देसी हों या परदेसी हों, नीले पीले गोरे काले
मक्खी भुनगे भिन-भिन करते ढूंढे हैं मकड़ी के जाले,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी!
कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेजारी,
कब तक सरमाए के धंदे, कब तक यह सरमायादारी,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम
धोखा और मज़दूरों को दें, ऐसे तो मज़बूर नहीं हम,
मंज़िल अपने पाँव के नीचे, मंज़िल से अब दूर नहीं हम,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

बोल कि तेरी खिदमत की है, बोल कि तेरा काम किया है,
बोल कि तेरे फल खाये हैं, बोल कि तेरा दूध पिया है,
बोल कि हमने हश्र उठाया, बोल कि हमसे हश्र उठा है,
बोल कि हमसे जागी दुनिया
बोल कि हमसे जागी धरती
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!
-मजाज़ लखनवी

मध्यम वर्ग का गीत


खाते-पीते, दहशत जीते
घुटते-पिटते बीच के लोग।


वर्ग-धर्म पटकनी लगाता,
माहुर माते बीच के लोग।


घर में घर की तंगी-मंगी,
भ्रम में भटके बीच के लोग।


लोभ-लाभ की माया लादे,
झटके खाते बीच के लोग।


घना समस्याओं का जंगल,
कीर्तन गाते बीच के लोग।


नीचे श्रमिक, विलासी ऊपर,
बीच में लटके बीच के लोग।


-शील

फिरंगी चले गए


करती है दिन को रात सियासत सुदेश की,
बो कर कलह के बीज, फिरंगी चले गए।


भ्रम की भँवर थी, ख़ुश थे, अहिंसा से जय मिली,
दुश्मन बने अजीज़, फिरंगी चले गए।


आते हैं शील ज़लज़ले, ईमान की क़सम,
राहें हुईं ग़लीज़, फिरंगी चले गए।


रहबर ही कर रहे हैं यहाँ, राहज़न के काम,
मांगे मिली तमीज़, फिरंगी चले गए।


हम यौमे-स्वतंत्रता को फ़क़त देखते रहे,
लग़ज़िश लगी लज़ीज़, फिरंगी चले गए।


-शील

मैं न हारा


राह हारी मैं न हारा
थक गए पथ धूल के
उड़ते हुए रज-कण घनेरे।
पर न अब तक मिट सके हैं,
वायु में पदचिन्ह मेरे।
जो प्रकृति के जन्म ही से ले चुके गति का सहारा।
राह हारी मैं न हारा


स्वप्न-मग्ना रात्रि सोई,
दिवस संध्या के किनारे।
थक गए वन-विहग, मृगतरु-
थके सूरज-चाँद-तारे।
पर न अब तक थका मेरे लक्ष्य का ध्रुव ध्येय तारा।
राह हारी मैं न हारा।


-शील

आदमी का गीत


देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल
नया संसार बसाएंगे, नया इन्सान बनाएंगे
सौ-सौ स्वर्ग उतर आएंगे,
सूरज सोना बरसाएंगे,
दूध-पूत के लिए पहिनकर
जीवन की जयमाल,
रोज़ त्यौहार मनाएंगे,
नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे।
देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाएंगे, नया इन्सान बनाएंगे॥


सुख सपनों के सुर गूँजेंगे,
मानव की मेहनत पूजेंगे
नई चेतना, नए विचारों की
हम लिए मशाल,
समय को राह दिखाएंगे,
नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे।
देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाएंगे, नया इन्सान बनाएंगे॥


एक करेंगे मनुष्यता को,
सींचेंगे ममता-समता को,
नई पौध के लिए, बदल
देंगे तारों की चाल,
नया भूगोल बनाएंगे,
नया संसार बसाएंगे, नया इन्सान बनाएंगे।
देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाएंगे, नया इन्सान बनाएंगे॥


-शील

Tuesday, November 15, 2011

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परीशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं,ऐसा हुआ होगा

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा

चलो, अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें
कम-अज-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा

-दुष्यंत कुमार

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,
और नदियों के किनारे घर बने हैं ।

चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर,
इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं ।

इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं,
जिस तरह टूटे हुए ये आइने हैं ।

आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन,
इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं ।

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं ।

अब तड़पती-सी ग़ज़ल कोई सुनाए,
हमसफ़र ऊँघे हुए हैं, अनमने हैं ।

-दुष्यंत कुमार

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार

आप बच कर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं
रहगुज़र घेरे हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार

रोज़ अखबारों में पढ़कर यह ख़्याल आया हमें
इस तरफ़ आती तो हम भी देखते फ़स्ले—बहार

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं
बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके—जुर्म हैं
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार

हालते—इन्सान पर बरहम न हों अहले—वतन
वो कहीं से ज़िन्दगी भी माँग लायेंगे उधार

रौनक़े-जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं
मैं जहन्नुम में बहुत ख़ुश था मेरे परवरदिगार

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर
हर हथेली ख़ून से तर और ज़्यादा बेक़रार

-दुष्यंत कुमार

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़ुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर
तु इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं

ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं

-दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए 

-दुष्यंत कुमार

जीवन-लक्ष्‍य

कठिनाइयों से रीता जीवन
मेरे लिए नहीं,
नहीं, मेरे तूफानी मन को यह स्‍वीकार नहीं।
मुझे तो चाहिए एक महान ऊंचा लक्ष्‍य
और उसके लिए उम्र भर संघर्षों का अटूट क्रम।

ओ कला! तू खोल
मानवता की धरोहर, अपने अमूल्‍य कोषों के द्वार
मेरे लिए खोल!
अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्‍व को बांध लूंगा मैं!

आओ,
हम बीहड़ और कठिन सुदूर यात्रा पर चलें
आओ, क्‍योंकि -
छिछला, निरुद्देश्‍य और लक्ष्‍यहीन जीवन
हमें स्‍वीकार नहीं।
हम, ऊंघते कलम घिसते हुए
उत्‍पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे।
हम - आकांक्षा, आक्रोश, आवेग, और
अभिमान में जियेंगे!
असली इन्‍सान की तरह जियेंगे।
-कार्ल मार्क्स

और बचे रहें स्वप्न

मेरी आत्मा जिस बात की गिरफ्त में आ चुकी है
उसके रहते मैं कभी भी शांत नहीं बैठ सकता
कभी भी चीजों को सामान्य ढंग से नहीं ले सकता
मुझे आगे बढ़ते रहना है, बिना विराम के।
अतः आओ, हम सारा कुछ दांव पर लगा दें
न आराम करें, न थकान को तरजीह दें
न रहें गमगीन खामोशी के आगोश में
न होने दें बुद्धि को मंद
बिना गति की इच्छा के, बगैर चाहत के
बुदबुदाता हुआ अंतर्चिंतन में नहीं,
न दर्द के हल के नीचे दबें
ताकि हममें बची रहें इच्छाएं
और
बचे रहें स्वप्न, बची रहे कारवाई,
भले ही वे अपूर्ण ही क्यों न हों।
-कार्ल मार्क्स

Monday, November 14, 2011

आजादी

शेरों को आजादी है, आजादी के पाबंद रहे,
जिसको चाहें चीरे-फाड़ें, खाए पियें आनंद रहे।

सापों को आजादी है हर बसते घर में बसने की,
उनके सर में जहर भी है और आदत भी है डसने की।

शाही को आजादी है, आजादी से परवाज करे,
नन्ही-मुन्नी चिड़ियों पर जब चाहे मश्के-नाज करें।

पानी में आजादी है घडियालों और निहंगो को,
जैसे चाहे पालें-पोसें अपनी तुंद उमंगो को।

इंसा ने भी शोखी सीखी वहशत के इन रंगों से,
शेरों, सापों, शाहीनो, घडियालों और निहंगो से।

इंसा भी कुछ शेर है, बाकी भेड़ की आबादी है,
भेडें सब पाबंद हैं लेकिन शेरों को आजादी है।

शेर के आगे भेडें क्या हैं, इक मनभाता खाजा है,
बाकी सारी दुनिया परजा, शेर अकेला राजा है।

भेडें लातादाद हैं लेकिन सबकों जान के लाले हैं,
उनको यह तालीम मिली है, भेडिए ताकत वाले हैं।

मांस भी खाएं, खाल भी नोचें, हरदम लागू जानो के,
भेडें काटें दौरे-गुलामी बल पर गल्लाबानो के।

भेडियों ही से गोया कायम अमन है इस आजादी का,
भेडें जब तक शेर न बन ले, नाम न ली आजादी का।

इंसानों में सांप बहुत हैं, कातिल भी, जहरीले भी,
उनसे बचना मुश्किल है, आजाद भी हैं, फुर्तीले भी।

सरमाए का जिक्र करो, मजदूर की उनको फ़िक्र नही,
मुख्तारी पर मरते हैं, मजबूर की उनको फ़िक्र नही।

आज यह किसका मुंह ले आए, मुंह सरमायेदारों के,
इनके मुंह में दांत नही, फल हैं खुनी तलवारों के।

खा जाने का कौन सा गुर है को इन सबको याद नही,
जब तक इनको आजादी है, कोई भी आजाद नही।

उसकी आजादी की बातें सारी झूठी बातें हैं,
मजदूरों को, मजबूरों को खा जाने की घातें हैं।

जब तक चोरों, राहजनो का डर दुनिया पर ग़ालिब है,
पहले मुझसे बात करे, जो आजादी का तालिब है।

-हफीज जालंधरी

Thursday, November 10, 2011

जनरल तुम्हारा टैंक एक मजबूत वाहन है

जनरल तुम्हारा टैंक एक मजबूत वाहन है
वह रौंद डालता है जंगल को
और कुचल डालता है सैंकड़ों आदमियों को
लेकिन उसमें एक खराबी है-
उसे एक ड्राइवर चाहिए


जनरल तुम्हारा बम-वर्षक बहुत मजबूत है
वह हवा से तेज उड़ता है और ढोता है
हाथी से भी अधिक।
लेकिन उसमें एक खराबी है
उसे एक मिस्त्री चाहिए


जनरल आदमी कितना उपयोगी है
वह उड़ सकता है और मार सकता है
लेकिन उसमें एक खराबी है
वह सोच सकता है


- बेर्टोल्ट ब्रेख्ट

Tuesday, November 8, 2011

सबसे ख़तरनाक

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

क्रान्ति दावत नहीं


सितारों की ओर देख क्रान्ति लाने की
सलाह देने वालों.
क्रान्ति जब आएगी
आपको तारे दिखा देगी
बन्दूकवालों!
या तो बन्दूक का मुंह दुश्मन की ओर कर दो
या फिर खुद अपनी ओर
क्रान्ति कोई दावत नहीं, नुमाइश नहीं
मैदान में बहती नदी नहीं.
वर्गों की, रुचियों की दरिन्दगी भरी भिडंत है.
मारना है, मरना है
और मौत को ख़त्म करना है.
-पाश