Monday, January 21, 2013

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

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मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था, मैने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये 

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा 

अनगिनत सदियों से तारीक़ बहीमाना तिलिस्म
रेशमो-अतलसो-किमख़्वाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ए-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून मे नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे 

और भी दुख हैं ज़माने मे मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की रहत के सिवा 

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

-फैज अहमद 'फैज'
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दरख़्शां = प्रकाशमान,  हयात = जीवन,  ग़मे-दहर = सांसारिक चिंताएँ, 
आलम = दुनिया, सबात = स्थायित्व, निगूँ = तक़दीर सिर झुका ले
फ़क़त = केवल, राहत = सुख, वस्ल = मिलन
तारीक़ बहीमाना तिलिस्म = प्राचीन अज्ञानपूर्ण अंधविश्वास रूपी तिलिस्म
रेशमो-अतलसो-किमख़्वाब = एक प्रकार के कीमती वस्त्र
अमराज़ के तन्नूर = शरीर रूपी तंदूर से रोग के कारण निकले हुए
नासूर = घाव, दिलकश = आकर्षक



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